आचार्य समता सागर महाराज के सानिध्य में पंचामृत अभिषेक एवं शांति धारा की गई

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दोवड़ा।। श्री मुनिसुव्रत नाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र हथाई में पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन आचार्य शांतिसागर जी महाराज (छाणी) परंपरा के पट्टाचार्य आचार्य 108 श्री समता सागर जी महाराज के सानिध्य में पंचामृत अभिषेक व शांति धारा की गई तत्पश्चात उत्तम आर्जव धर्म पर प्रवचन दिया गया। समाज के सेठ सिंघवी सुधीर कुमार जैन ने बताया कि आचार्य ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तम आर्जव धर्म जैन धर्म ही नहीं बल्कि व्यापार चलाने का एक साधन भी है। व्यक्ति वचन से कुछ और बोलता है और मन में कुछ और भाव रखता है एवं तन से कुछ और कहता करता है यही मायाचारी का प्रदर्शन है । मायाचारी छोड़ना ही उत्तम आर्जव धर्म होता है व्यक्ति को जो मन में है, वही वचन से बोलना चाहिए, उसी के अनुरूप कार्य करना चाहिए। सभी धर्मों के  नियम आर्जव धर्म पर ही टिके हुए होते हैं जो शास्त्र में लिखा है एवं जो धर्म में है उसी के अनुसार सभी नियमों का पालन करना आर्जव धर्म है। जैन सिद्धांत अहिंसा धर्म को मन वचन काया से धारण करना ही आर्जव धर्म है। किसी को धोखा देना, ठगना, कुकर्म करना, चोरी आदि सभी माया चारी कहलाता है। इसी मायाचार का त्याग करना उत्तम आर्जव धर्म होता है। जो आत्मा के स्वरूप की तरफ प्रेरित करता है, वही वास्तविक सर्वव्यापी आर्जव धर्म है। प्रवचन के पश्चात आचार्य का आहार संपन्न हुआ एवं मंदिर जी में नित्य पूजन एवं विधान की पूजा का आयोजन किया गया। इस दौरान समाज के अध्यक्ष राजेंद्र सिंघवी,उपाध्यक्ष कांतिलाल गाँधी, महामंत्री सूरजमल गाँधी, छबिलाल गाँधी, मणिलाल गाँधी, ललित गाँधी, नानालाल एस गाँधी, नानालाल एम गाँधी, महिपाल गाँधी, देवेंद्र गांधी, वीरप्रकाश भंवरा, महेंद्र सिंघवी, सुरेंद्र गाँधी, पंकज गाँधी, पवन गाँधी, विपुल सिंघवी,प्रवीण भंवरा, नीलेश गाँधी, रजनीश गांधी,अंकित गाँधी,अर्पित गाँधी आदि समाज जन उपस्थित थे।

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