चैलेंज से सफलता में आत्मिक सुख नहीं

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अन्तर्मुखी की मौन साधना का 26वां दिन

सोमवार, 30 अगस्त, 2021 भीलूड़ा

मुनि पूज्य सागर की डायरी से……..

मौन साधना का 26वां दिन। किसी ने चैलेंज किया कि तुम यह नहीं कर सकते हो। उस समय आप जो करके दिखा देते हो, कषाय में किया कार्य होगा क्योंकि तुम्हें किसी ने चैलेंज किया है इसलिए आपने वह काम किया। जब चैलेंज से सफलता मिलती है तो उससे आत्मिक सुख नहीं मिलता बल्कि किसी को हराया है, अंदर से यह भाव आते हैं। यह भाव ही तो राग- द्वेष को जन्म देता है। इसी कारण इंसान कई बार गलत निर्णय और नकारात्मक सोच को जन्म दे देते हैं। चैलेंज मिलने पर जो कार्य इंसान करता है, उससे इंसान के अंदर की प्रतिभा तो बाहर आती है पर प्रतिभा के साथ अहंकार का भी जन्म हो जाता है। इसका परिणाम भविष्य में सुखद नहीं होता है।

जो प्रतिभा अपने आप स्वयं प्रेरणा से बाहर आती है, उसमें आत्मिक सुख अंदर होता है। न किसी को हराने का और न ही किसी को नीचा दिखाने का भाव-विचार मन में होता है। बस यही खुशी होती है कि मैंने कुछ अच्छा किया है। चैलेंज में कार्य करना तो आ जाता है, पर अनुभव नहीं आता है क्योंकि चैलेंज में सामने वाले से अच्छा करना यह बुद्धि में होता है। आत्मिक स्वयं प्रेरणा से निकला कार्य हमारी अपनी सोच और खोज का परिणाम होता है जिसे करते समय अनुभव होता है कि कार्य कैसे किया जाता है और किया गया। ऐसे में आप के अनुभवों का अन्य लोग अनुसरण करते हैं।

बचपन से जब हम बच्चों को चैलेंज में डाल देते हैं तो उसके संस्कार चैलेंज वाले ही हो जाते हैं। हम हमें देखते हैं कि जब  बच्चा पढ़ने में कमजोर होता है और नम्बर कम आते हैं तो उस समय हम क्या कहते हैं- देख स्कूल में, तेरे दोस्त के तेरे से अधिक नम्बर आए हैं। यह स्थिति अन्य क्षेत्र में भी होती है। इस प्रकार की नकारात्मक सोच और चैलेंज में जब बच्चा फैल हो जाता है वह आत्महत्या कर लेता है। यह हम देख भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं। इंसान इसलिए ऐसा कर जाता है क्योंकि वह यह सोच लेता है कि मैं उससे हार गया। वह अंदर ही अंदर अपने आप को हीन और कमजोर समझता है।  चैलेंज के चक्कर के कारण ही इंसान के अंदर कषायों का जन्म हो जाता है।

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